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शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

hey eshwar (tanu thadani)

बात निकलेगी तो आँखों मे आंसू  आयेगे,
हम लड़  बेठेगें,
फिर बाद में पछ्तायेगे !

नीचा करने की तमन्ना मे ,
एक दूसरे को ,
क्या ,
खुद ही  की नजरो में ना गिर जायेगे!!

जायं ना मस्जिदों  मे हम तौबा करने ,
ना मंदिरों मे जा के हम माफ़ी मांगे !
कायदा ये हो कि,हर भूल से हम यूँ  निपटे ,
गले मिले.
मगर,जिद कि भी दीवार लांघे!!

हमारी सोच अच्छी है कि बुरी ,सोच लो तुम ,
हमारी सोच फिर से लौट -लौट आएगी !
हमारी फूल सी मासूम नई पीढ़ी में ,
हमारी सोच ही सोचो  तो नज़र आएगी!!

कहानी नफरतो वाली ही सुनाते जो रहें ,
हमारे बच्चो में मुस्कान कहाँ पायेगें ?
जो हम हिन्दू-मुसलमान ही पैदा करें तो ,
आदमी नस्ल के बच्चे कहाँ से लायेंगे ?? 








1 टिप्पणी:

  1. विचार पक्ष स्पष्ट है. कविता वाले पक्ष पर थोड़ी और मेहनत होनी चाहिए. भाषा सहज है, पर हिज्जे(spelling) कि गलतियों पर क़ाबू पाने की कोशिश भी होनी चाहिए.

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